24 क्रेडिट का सेमेस्टर

कल फिर आई थी वो! 
मगर अफ़सोस, वो मिल नहीं पाया उससे!!

न जाने क्यूँ, 

पिछले कुछ दिन से… उसके आने का अंदेशा तो था उसे!

शायद सुन चुका था वो… सड़क के किनारे पड़ी हुई उन सूखी पत्तियों की बातें! 

या फिर भाँप चुका था बेपरवाह बहती हवाओं के तेवर!!

वक़्त गुज़रता जा रहा था… 

रात और भी गहरी हो रही थी!

एक ओर ये बावला मन मिलन की आस जगाए बैठा था…

वहीं कम्बख़त दिमाग़ न जाने कहाँ से अगली सुबह होने वाले “क्लास टेस्ट” की याद दिला रहा था!

खैर, दिल और दिमाग़ की जंग में एक बार फिर वो

खुद को हार गया!

और जब सुबह उठा… 

तो पता चला…

कि कल फिर आई थी वो…

वो “बे-मौसम बरसात”!

और अपने पीछे छोड़ गयी थी…

“24 क्रेडिट का सेमेस्टर” और 10 नंबर का “क्लास टेस्ट”!

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मुक़दमा

मुक़दमा रोमांचक मोड़ पर है,

सब सबूत उनके खिलाफ मिले हैं।

“जी हाँ, दोष उन्हीं दो आँखों का है”

आज मेरे आँसू गवाह बने हैं।

दिल

जो लोग दूसरों की आँखों में आँसू बोते रहते हैं,

सच है, उनके अपने दिल बंजर जमीं ही रहते हैं।

शक

मुझे शक है कि भूलने लगा हूँ खुद ही को मैं,

शर्त लेकिन ये थी कि मुझे बहुत कुछ याद रखना है।

पंछी

पलकों के छज्जों पर हैं ख्वाबों के पंछी,

इन्हें बुलाऊँ क्या?

पीने को माँगें जो पानी,

आँसू बन जाऊँ क्या?

कर्म

निज जीवन की समर-भूमि में कर्ण तू है, तू ही पार्थ है।

विजय निश्चित पा जाएगा, यदि कर्म तेरा पुरुषार्थ है।।

अंतर

मुझमें और सरकारी खजाने में बस इतना सा ही अंतर है,

मैं दिल्ली से चलता हूँ, तो गाँव तक पहुँचता हूँ।

वजूद

खो मत देना अपना वजूद इन ऊँची ईमारतों में,

मैंने कच्चे घर की दीवारों को कविता बनते देखा है।