24 क्रेडिट का सेमेस्टर

कल फिर आई थी वो! 
मगर अफ़सोस, वो मिल नहीं पाया उससे!!

न जाने क्यूँ, 

पिछले कुछ दिन से… उसके आने का अंदेशा तो था उसे!

शायद सुन चुका था वो… सड़क के किनारे पड़ी हुई उन सूखी पत्तियों की बातें! 

या फिर भाँप चुका था बेपरवाह बहती हवाओं के तेवर!!

वक़्त गुज़रता जा रहा था… 

रात और भी गहरी हो रही थी!

एक ओर ये बावला मन मिलन की आस जगाए बैठा था…

वहीं कम्बख़त दिमाग़ न जाने कहाँ से अगली सुबह होने वाले “क्लास टेस्ट” की याद दिला रहा था!

खैर, दिल और दिमाग़ की जंग में एक बार फिर वो

खुद को हार गया!

और जब सुबह उठा… 

तो पता चला…

कि कल फिर आई थी वो…

वो “बे-मौसम बरसात”!

और अपने पीछे छोड़ गयी थी…

“24 क्रेडिट का सेमेस्टर” और 10 नंबर का “क्लास टेस्ट”!

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पात्र

“सभी पात्र काल्पनिक हैं…                                  और द्रव वास्तविक है।”                                 ~अमन.

छोटे बच्चे

जगह जगह पर पेड़ों के

जब शव दफ़नाए जाते हैं,

ऐसे गाँवों को काट-काट,

कुछ शहर बनाए जाते हैं।

यूँ तो सारी कच्ची गलियाँ

पक्की सी हो जाती हैं,

इसी तरह उस इलाके की

तरक्की भी हो जाती है।

पर यही तरक्की हमसे

एक नई पहल कराने लगती है,

सब मैदानों-बागीचों पर

महल बनाने लगती है।

उसकी यही हरकत मुझे

फिर संजीदा कर जाती है,

भीतर बसे किसी बच्चे को

फिर जिंदा कर जाती है।

जो पूछता है सवाल,

उसे जवाब नहीं मिल पाते हैं,

ये बड़े शहर में छोटे बच्चे

कहाँ खेलने जाते हैं?

अब नहीं भीगते बारिशों में,

ना कागज की नाव बनाते हैं,

क्यों बड़े शहर में छोटे बच्चे

जल्दी बड़े हो जाते हैं?

~अमन

कवि

न कोई ख़बर, न सुर्खी और न ही इश्तिहार बनना है,

वो कवि है, उसेे हर डूबती नौका की पतवार बनना है।

जुगनू

अक्सर रात के अँधेरों में ही दिखते हैं जुगनू,

ये सबको नहीं मिलते।

दिन में भी देखा मैंने,

इन्हें तड़पते हुए,

अँधेरों को बुझते हुए।

कि ये तड़प, ये अँधेरे और ये जुगनू,

मेरी हस्ती का हिस्सा हो गए हैं।

कहानियाँ तो सारी गुम हैं कहीं,

इस शहर और दौड़ती सड़कों के लिए हम एक किस्सा हो गए हैं।

और कमबख्त शहर है कि मुझे अपनाता नहीं है।

हाँ, खामोशियाँ जरूर हैं मेरे कमरे में,

मगर यहाँ इस शहर की भीड़ जैसा सन्नाटा नहीं है।

मुक़दमा

मुक़दमा रोमांचक मोड़ पर है,

सब सबूत उनके खिलाफ मिले हैं।

“जी हाँ, दोष उन्हीं दो आँखों का है”

आज मेरे आँसू गवाह बने हैं।

दिल

जो लोग दूसरों की आँखों में आँसू बोते रहते हैं,

सच है, उनके अपने दिल बंजर जमीं ही रहते हैं।

शक

मुझे शक है कि भूलने लगा हूँ खुद ही को मैं,

शर्त लेकिन ये थी कि मुझे बहुत कुछ याद रखना है।